नौमान बिन बशरीर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- कहते हैं कि उनकी माँ अमरा बिंत रवाहा ने उनके पिता बशीर से आग्रह किया कि वह अपने धन से अमरा के बेटे (नौमान) को कोई भेंट दे दें। बशीर उनके इस आग्रह को एक साल तक टालते रहे और उसके बाद उनको लगा कि इस आग्रह को स्वीकार कर लेना चाहिए और नौमान को कोई उपहार देना चाहिए। लेकिन अब अमरा ने कह दिया : मैं उस समय तक संतुष्ट नहीं हो सकती, जब तक आप मेरे बेटे को दिए गए इस उपहार का गवाह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को न बना लें। चूँकि मैं उस समय छोटा बच्चा था, इसलिए मेरे पिता ने मेरा हाथ पकड़ा, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास पहुँचे और कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! इस बच्चे की माँ रवाहा की बेटी की इच्छा है कि मैं अपने बेटे को दिए गए उपहार का गवाह आपको बनाऊँ। उनकी बात सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पूछा : ऐ बशीर! क्या तुम्हारे और भी बच्चे हैं? जवाब दिया : जी हाँ (हैं)। पूछा : क्या तुमने उन सब को भी इसी प्रकार का उपहार दिया है? उत्तर दिया : जी नहीं। फ़रमाया : तब तुम मुझे इसका गवाह मत बनाओ। क्योंकि मैं किसी अन्याय एवं अत्याचार का गवाह नहीं बनता। सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है कि आपने उन्हें डाँटते हुए फ़रमाया : तुम इस अन्याय का गवाह किसी और को बना लो।