कुछ निर्धन सहाबा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर अपनी ग़रीबी और अपने मालदार भाइयों की तरह सदक़ा करके बड़ा सवाब प्राप्त न कर पाने और नेकी के कामों में उनके बराबर न हो पाने की शिकायत की और कहा कि हम नमाज़ पढ़ते हैं तो वह भी नमाज़ पढ़ते हैं और हम रोज़ा रखते हैं तो वह भी रोज़ा रखते हैं, लेकिन इसके साथ ही वह अपने अतिरिक्त धन में से सदक़ा करके हम से आगे बढ़ जाते हैं, जबकि हमारे पास सदक़ा करने के लिए कुछ नहीं होता। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको सदक़े के कुछ ऐसे रूप बता दिए, जो वे कर सकते थे। फ़रमाया : क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए सदक़ा करने की राहें निकाल नहीं रखी हैं? 'सुबहानल्लाह' कहना सदक़ा है, 'अल्लाहु अकबर' कहना सदक़ा है, 'अल-हम्दु लिल्लाह' कहना सदक़ा है, 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना सदक़ा है, भलाई का आदेश देना सदक़ा है, बुराई से रोकना सदक़ा है, बल्कि अपनी पत्नी से संभोग करना भी सदक़ा है। सहाबा को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! हमें अपनी वासना पूरी करने का भी सवाब मिलेग? आपने उत्तर दिया : अच्छा यह बताओ कि अगर वह हराम जगह से वासना पूरी करे, जैसे व्यभिचार आदि में लिप्त हो जाए, तो गुनाह होगा या नहीं? बस इसी तरह अगर वासना हलाल जगह से पूरी करता है, तो सवाब मिलेगा।