अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) इस आयत की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यह पूजित प्रतिमाएँ, जिनके बारे में अल्लाह तआला ने बताया है कि नूह (अलैहिसल्लाम) के द्वारा अपनी क़ौम को इस बात से मना किए जाने के बाद भी कि किसी को अल्लाह का साझी न ठहराना, उनकी क़ौम के लोगों ने आपस में एक-दूसरे को उनकी इबादत जारी रखने की ताकीद की थी, दरअसल उनके कुछ सदाचारी लोगों के नाम हैं। हुआ यह कि नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने शैतान के बहकावे में आकर उनके बारे में अतिशयोक्ति की और उनका चित्र लगा लिया। फिर एक दिन ऐसा आया कि इन चित्रों को बुत में बदल दिया गया और उनकी पूजा आरंभ हो गई।