अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों से कहा कि अगले दिन मुसलमान मदीना के पास स्थित शहर ख़ैबर के यहूदियों पर विजयी होंगे। यह विजय उस व्यक्ति के हाथ पर होगी जिसे आप झंडा प्रदान करेंगे, झंडा से मुराद वह ध्वज है जिसे सेना प्रतीक के रूप में अपनाती है। इस व्यक्ति की एक विशेषता यह होगी कि वह अल्लाह और उसके रसूल से प्रेम करता है और अल्लाह और उसके रसूल उससे प्रेम करते हैं। उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि एक वही दिन था, जब उनके अंदर सरदारी पाने की इच्छा जागी थी और दिल में बुलाए जाने की ख़्वाहिश इस आशा में पैदा हुई थी कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा उल्लिखित अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत प्राप्त करने का सौभाग्य उनको मिल जाए। उन्होंने अपने शरीर को इस आशा में एड़ियों के सहारे ऊंचा किया कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनको देख लें, उनको बुला लें और झंडा प्रदान कर दें। लेकिन अल्लाह के नबी सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम ने अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहु को बुला भेजा, उन्हें झंडा प्रदान किया और आदेश दिया कि सेना के साथ चल पड़ें और दुश्मन से मिलने के बाद उनके क़िलों पर वर्चस्व प्राप्त करने तक न आराम करें, न पीछे हटें और न ही युद्धविराम करें। चुनांचे अली रज़ियल्लाहु अनहु चल पड़े। एक बार रुके भी तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश के उल्लंघन से बचने के लिए पीछे मुड़े नहीं, ख़ैबर की ओर मुँह करके ही ऊँची आवाज़ में पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैं लोगों से किस बात पर जंग करूँ? अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : उनसे उस समय तक जंग करो, जब तक इस बात की गवाही न दे दें कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूजे नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। अगर उन्होंने तुम्हारे इस आह्वान को क़बूल कर लिया और इस्लाम में दाख़िल हो गए, तो उन्होंने अपने रक्त एवं अपने धन को तुमसे सुरक्षित कर लिया। हाँ, अगर वे ऐसा अपराध कर बैठें कि इस्लाम के प्रावधानों के आलोक में क़त्ल के हक़दार बन जाएँ, तो बात अलग है। बाक़ी, उनका हिसाब लेना अल्लाह का काम है।