अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "कोई मोमिन पुरुष किसी मोमिन स्त्री से नफ़रत न करे। यदि वह उसके किसी काम को नापसंद करता है, तो उसके किसी दूसरे (अथवा अन्य) काम को पसंद करेगा।" स़ह़ीह़ - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
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व्याख्या

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पति को अपनी पत्नी से इस तरह नफ़रत करने से मना किया है कि उसपर अत्याचार करने, उसे छोड़ रखने तथा उसे भुला देने की नौबत आ जाए। क्योंकि हर इन्सान के अंदर प्राकृतिक रूप से कमियाँ मौजूद हैं। अगर उसकी कोई बात नापसंद होगी, तो कोई बात पसंद ज़रूर होगी। अतः जो बात पसंद हो, उसपर प्रसन्न रहे और जो बात पसंद न हो, उसपर सब्र करे। इससे खुशगवार वातावरण बनेगा और नापसंदीदगी इस हद तक नहीं पहुँचेगी कि अलगाव की स्थिति आ जाए।

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हदीस का संदेश

  • इस हदीस में मोमिन को न्याय करने, पत्नी के साथ होने वाले हर झगड़े में विवेक से काम लेने और भावनाओं में बहकर कोई काम न करने की प्रेरणा दी गई है।
  • एक मोमिन की शान यह होनी चाहिए कि वह अपनी पत्नी से इस तरह नफ़रत न करे कि अलगवा की नौबत आ जाए। उसकी नापसंद बातों में नज़र बचाकर उन बातों पर ध्यान देना चाहिए, जो पसंद हों।
  • सुंदर दामपत्य जीवन बिताने की प्रेरणा।
  • ईमान अच्छे आचरण धारण करने की प्रेरणा देता है। मोमिन पुरुष एवं मोमिन स्त्री अच्छे आचरण रहित नहीं हो सकते। अगर ईमान है, तो आचरण अच्छा ज़रूर होगा।
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