जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है : "तुममें से हर व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में आनी चाहिए कि वह अल्लाह से अच्छा गुमान रखता हो।" स़ह़ीह़ - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
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व्याख्या

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि एक मुसलमान की मृत्यु अल्लाह से अच्छा गुमान रखते हुए ही होनी चाहिए। मरते वक़्त उम्मीद का पहलू प्रबल होना चाहिए और दिल में यह उम्मीद होनी चाहिए कि अल्लाह उसपर रहम करेगा और उसे माफ़ कर देगा। क्योंकि असल में, डर की ज़रूरत कर्मों को बेहतर बनाने के लिए होती है और वह समय कर्म का होता नहीं है। इसलिए, वहाँ उम्मीद का पहलू प्रबल होना चाहिए।

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हदीस का संदेश

  • अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को अपनी उम्मत से बड़ा प्यार था, इसलिए परिस्थिति जो भी हो, उसका मार्गदर्शन करने से चूकते नहीं थे। यहाँ तक कि जिस बीमारी में आपकी मृत्यु हो गई उसमें भी अपनी उम्मत को नसीहत करने एवं मुक्ति के मार्ग बताने में कोई कमी नहीं की।
  • तीबी कहते हैं : अभी से अपने कर्मों को सुधार लो, ताकि मरते समय अल्लाह से अच्छा गुमान रख सको। क्योंकि जिसने मरने से पहले बुरे कर्म किए होंगे, वह मरने के समय अल्लाह से अच्छा गुमान नहीं रख पाएगा।
  • एक बंदे के लिए सबसे उत्तम अवस्था आशा और भय के बीच संतुलन और प्रेम की प्रधानता है। प्रेम वाहन है, आशा पथप्रदर्शक है, भय चालक है, और अल्लाह अपनी कृपा और दया से उसे उसकी मंज़िल तक पहुँचाता है।
  • जब किसी की मृत्यु का समय आए, तो उसके आस-पास उपस्थित लोगों को चाहिए कि वह बीमार के मन में अल्लाह से आशा और अल्लाह के प्रति अच्छे विचार को प्रबल करे। क्योंकि इस हदीस में वर्णन है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपनी मृत्यु से तीन दिन पहले यह बात कही थी।