अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हवाले से अल्लाह के इस कथन के बारे में कहते हैं : (तथा जो उसमें अत्याचार से अधर्म का विचार करेगा, हम उसे दुःखदायी यातना चखायेंगे।) [सूरा हज्ज : 25] फ़रमाया : "अगर कोई व्यक्ति (यमन के) अदन (नगर) में रहकर भी इसमें किसी अधर्म का इरादा करेगा, उसे अल्लाह कष्टदायक अज़ाब चखाएगा।" स़ह़ीह़ - इसे अह़मद और ह़ाकिम ने रिवायत किया है
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व्याख्या

अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु ने सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के कथन : {وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ} [सूरा हज्ज : 25] के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में नक़ल किया है कि आपने कहा है : अगर किसी व्यक्ति ने हरम-ए-मक्का के अंदर कोई ऐसी बात कहने या ऐसा काम करने का इरादा किया, जिससे अल्लाह की हराम की हुई चीज़ हलाल होती है और जानता भी हो कि यह अत्याचार है, तो वह इस बात का हक़दार बन जाता है कि अल्लाह इसके कारण उसे कष्टदायी अज़ाब दे। चाहे उसने यह इरादा यमन के अदन शहर में रहकर ही क्यों न किया हो। वह यह काम न भी कर सके, तो उसका इरादा कर लेना मात्र ही गुनाहगार होने के लिए काफ़ी है।

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हदीस का संदेश

  • हरम की विशेषता एवं सम्मान का बयान।
  • सादी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि हरम का सम्मान करने की ज़रूरत बताई गई है तथा उसमें गुनाह के काम का इरादा करने तथा गुनाह के काम करने से सावधान किया गया है।
  • ज़ह्हाक कहते हैं : किसी-किसी दूसरी जगह रहकर भी मक्का में गुनाह का काम करने का इरादा करे और गुनाह का काम न भी कर सके, तब भी उसके लिए गुनाह लिख दिया जाता है।