अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सजदे की हालत में यह दुआ किया करते थे : “हे अल्लाह, तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा स्पष्ट-अस्पष्ट सभी को।” स़ह़ीह़ - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
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व्याख्या

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सजदे में यह दुआ किया करते थे : "اللهم اغفر لي ذنبي" यानी ऐ अल्लाह! मेरे सारे गुनाहों को क्षमा कर दे, उनपर पर्दा डाल दे और मुझे उनके कुप्रभावों से बचाए रख। "كله" सारे गुनाह, "دِقّه" छोटे और कम गुनाह "وجِلّه" तथा बड़े और अधिक गुनाह "وأوله" पहले गुनाह, "وآخره" अंतिम गुनाह और बीच के सारे गुनाह "علانيته وسره" खुले और छुपे गुनाह, जिन्हें तेरे सिवा कोई नहीं जानता।

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हदीस का संदेश

  • इब्न-ए-क़ैयिम कहते हैं : छोटे और बड़े, कम और ज़्यादा, पहले और बाद के तथा छुपे और खुले तमाम गुनाहों से व्यापक अंदाज़ में क्षमा इसलिए माँगी गई है, ताकि सभी गुनाहों से तौबा हो जाए। बंदा जिन्हें जानता है उनसे भी और जिन्हें नहीं जानता उनसे भी।
  • कहा गया है : आपने 'الجِلّ' से पहले 'الدِّق' का ज़िक्र इसलिए किया है कि माँगने वाला माँगते समय दर्जा-ब-दर्जा आगे बढ़ता है। दूसरी बात यह है कि बड़े गुनाह आम तौर पर छोटे गुनाहों पर आग्रह एवं उनके बारे में लापरवाही के नतीजे ही में सामने आते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि छोटे पाप ही बड़े पापों का ज़रिया हैं और ज़रिया का ज़िक्र पहले किया जाना चाहिए।
  • इन्सान को विनम्रता के साथ अल्लाह से छोटे-बड़े सभी पापों के लिए क्षमा माँगनी चाहिए।
  • नववी कहते हैं : इस हदीस में बार-बार दुआ करने और दुआ के शब्दों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की प्रेरणा दी गई है, यद्यपि उसके कुछ शब्द कुछ से बेनियाज़ कर देते हों।