अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आइशा रज़ियल्लाहु अनहा को कुछ सारगर्भित दुआएँ सिखाई हैं। यह चार दुआएँ हैैं : पहली दुआ : सभी अच्छाइयों के लिए आम दुआ है, (यानी): ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सारी और तमाम भलाइयाँ माँगता हूँ, जो निकट समय से संबंध रखने वाली हैं और दूर समय से संबंध रखने वाली हैं, जो मुझको मालूम हैं तेरे सिखाने की वजह से, और जो मुझे नहीं मालूम हैं, जिन्हें बस तू ही जानता है। और इस दुआ में सभी मामलों को अल्लाह के हवाले कर दिया गया है, जो असीम ज्ञान वाला, सबसे अधिक जानकार और कृपालु है। अतः, अल्लाह तआला उस मुसलमान के लिए सबसे बेहतर और सबसे उत्तम चीज़ चुनता है। (और मैं पनाह माँगता हूँ), और मैं सहारा लेता हूँ, और मैं (आपकी शरण में रक्षा चाहता हूँ, तमाम बुराईयों से—चाहे वह जल्द आने वाली हों या देर से आने वाली हों, उन तमाम से जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्हें मैं नहीं जानता)। दूसरी दुआ : ऐसी दुआ जो मुसलमान को दुआ में सीमा का उल्लंघन करने से बचाती है: यानी ऐ अल्लाह! मैं तुझसे वह भलाई माँगता हूँ, जो तेरे बंदे और तेरे नबी ने माँगी है, और मैं उस बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिससे तेरे बंदे और तेरे नबी ने शरण माँगी है। इसमें अल्लाह से विनती की गई है कि वह दुआ करने वाले को वह भलाइयाँ प्रदान करे, जो अंतिम नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ख़ुद अपने लिए माँगी हैं। आपके द्वारा माँगी गई चीज़ों को गिनवाया नहीं गया है। तीसरी दुआ : जन्नत में प्रवेश और जहन्नम से मुक्ति की दुआ, जो मुसलमान के जीवन का उद्देश्या और उसके कर्मों का मक़सद है: ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और तुझे राज़ी करने वाला हर वह कथन एवं कार्य भी, जो जन्नत से क़रीब करता हो। मैं जहन्नम से तेरी शरण माँगता हूँ क्योंकि तेरी दयादृष्टि न हो, तो कोई व्यक्ति बुरे कर्मों से बच नहीं सकता और तुझे नाराज़ करने वाले हर उस गुनाह वाले कथन एवं कार्य से भी, जो जहन्नम से क़रीब ले जाता है। चौथी दुआ : अल्लाह के हर निर्णय से संतुष्ट रहने की दुआ : मैं तुझसे विनती करता हूँ कि अपने हर निर्णय को मेरे हक़ में बेहतर बना दे और हर बात जिसको तू ने मेरे लिए निर्धारित कर दिया है मेरे हक़ में बेहतर बना दे। यह दरअसल अल्लाह के निर्णयों से संतुष्ट रहने की दुआ है।