पूरी की पूरी नमाज़ दरअसल बंदे के क्रियाकलाप एवं कथन के द्वारा अल्लाह की गौरव गाथा है। इस हदीस में नमाज़ की उस चीज़ का ज़िक्र है, जो उसकी असल पहचान है। अल्लाह की महिमा का वर्णन। अल्लाह ने तकबीर को नमाज़ की असल पहचान केवल इसलिए बनाया है, ताकि उसकी महानता और गौरव को सिद्ध किया जा सके। चुनांचे बंदा अल्लाहु अकबर कहते हुए सीधा खड़ा हो जाता है। फिर जब क़िराअत से फ़ारिग़ होकर रुकू के लिए झुकता है, तो अल्लाहु अकबर कहता है। फिर जब रुकू से उठता है, तो समिअल्लाहु लिमन हमिदह कहता है और बिलकुल सीधे खड़ा हो जाता है। फिर खड़े-खड़े अल्लाह की प्रशंसा करता है। फिर सजदे के लिए झुकते समय अल्लाहु अकबर कहता है। फिर सजदे से सिर उठाते समय अल्लाहु अकबर कहता है। फिर अंत तक पूरी नमाज़ में ऐसा ही करता है। दो तशह्हुद वाली नमाज़ में जब पहले तशह्हुद से खड़ा होता है, तो खड़े होते समय अल्लाहु अकबर कहता है। इस तरह से देखा जाए तो शरीयत ने रुकू से उठने को छोड़कर हर स्थिति परिवर्तन के समय अल्लाहु अकबर कहने का आदेश दिया है।