नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों को ज़ोहर की नमाज़ पढ़ाई। जब पहली दो रकअतें पढ़ चुके, तो पहले तशह्हुद के लिए बैठने के बजाय खड़े हो गए। मुक़तदी भी आपके साथ-साथ खड़े हो गए। यहाँ तक कि जब बाद की दो रकअतें पढ़ चुके तथा आखिरी तशह्हुद के लिए बैठ गए और उससे भी फ़ारिग हो गए एवं लोग आपके सलाम फेरने की प्रतीक्षा करने लगे, तो बैठे-बैठे ही आप ने 'अल्लाहु अकबर' कहा और सलाम फेरने से पहले नमाज़ के सजदों के जैसे दो सजदे किए, जो 'सह्व के सजदे' कहलाते हैं, फिर सलाम फेर दिया। दरअसल यह सजदे छूटे हुए तशह्हुद की भरपाई के लिए थे।