अल्लाह बंदे की तौबा उस समय तक ग्रहण करता है, जब तक प्राण कंठ तक न पहुँच जाए। जब प्राण कंठ तक पहुँच जाता है, तो तौबा ग्रहण नहीं होती। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "और उनकी तौबा (क्षमा याचना) स्वीकार्य नहीं, जो बुराईयाँ करते रहते हैं, यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मौत का समय आ जाता है, तो कहता हैः अब मैंने तौबा कर ली।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 18]