अबू अम्र बिन हफ़्स (रज़ियल्लाहु अंहु) ने अपनी पत्नी फ़ातिमा बिंत क़ैस (रज़ियल्लाहु अंहा) को तीन तलाक़ों में से अंतिम तलाक़ दे दिया। वैसे तो तीन तलाक़ प्राप्त स्त्री को उसके पति की ओर से 'नफ़क़ा' नहीं मिलता, लेकिन उन्होंने उनको कुछ जौ भेजे। फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अंहा) को लगा कि जब तक वह 'इद्दत' में हैं, उनके पति पर 'नफ़क़ा' वाजिब है, इसलिए उन्होंने इस जौ को नाकाफ़ी समझकर ठुकरा दिया। इसपर, अबू अम्र ने क़सम खाकर बताया कि उनके ऊपर कुछ देने की कोई ज़िम्मेवारी नहीं है। फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने इसकी शिकायत अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से की, तो आपने उन्हें बताया कि उनको न 'नफ़क़ा' मिलना है, न रहने के लिए मकान। तथा आपने उन्हें आदेश दिया कि उम्मे शरीक के घर में 'इद्दत' गुज़ारें। फिर, जब आपको बताया गया कि उम्मे शरीक के यहाँ सहाबा का आना-जाना लगा रहता है, तो उन्हें आदेश दिया कि अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम के यहाँ 'इद्दत' गुज़ारें। क्योंकि वह एक दृष्टिहीन व्यक्ति हैं। जब वह कपड़े उतारेंगी, तो वह उन्हें देख नहीं सकते। आपने उनको यह आदेश भी दिया कि जब 'इद्दत' समाप्त हो जाए, तो आपको बताएँ। जब वह 'इद्दत' गुज़ार चुकीं, तो मुआविया और अबू जह्म (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने उन्हें विवाह-संदेश भेजा। अतः, उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रामार्श लिया। चूँकि सामने कोई भी हो, उसका भला चाहना ज़रूरी है, (विशेष रूप से उसका तो कुछ अधिक ही, जो प्रामर्श माँगे) अतः, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनको दोनों में से किसी से शादी करने का आदेश नहीं दिया; क्योंकि अबू जह्म के तेवर स्त्रियों के प्रति कड़े रहते थे और मुआविया एक निर्धन व्यक्ति थे। आपने उन्हें उसामा से निकाह करने का आदेश दिया, लेकिन वह चूँकि एक मुक्त किए हुए दास थे, इसलिए फ़ातिमा वह नहीं भाए। लेकिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेश का पालन करते हुए उनसे शादी कर ली और बाद में उनके ऊपर नाज़ किया तथा अल्लाह ने उनके अंदर बहुत-सी भलाई रखी।