उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने अल्लाह के रास्ते में जिहाद के लिए एक व्यक्ति की सहायता की और उसे युद्ध करने के लिए एक घोड़ा दिया। लेकिन उस व्यक्ति ने घोड़े को सही से खाने नहीं दिया और उसकी सही देखभाल भी नहीं की। साथ ही उससे उसकी शक्ति से अधिक काम भी लिया। जिसके कारण वह कमज़ोर तथा दुर्बल हो गया। इसलिए उमर (रज़ियल्लाह अंहु) ने उसे उस व्यक्ति से ख़रीद लेना चाहा। उन्हें यह भी लगा कि कमज़ोर तथा दुर्बल होने के कारण वह कम दाम में मिल जाएगा। लेकिन इस बारे में वह संतुष्ट नहीं थे, इसलिए कोई क़दम उठाने से पहले अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पूछ लेना ज़रूरी समझा। लेकिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें उस घोड़े को ख़रीदने से मना कर दिया, यद्यपि काम दाम ही में क्यों न मिले। आपने समझाया कि जो वस्तु अल्लाह के लिए निकल चुकी है, उससे दिल मत अटका के रखो और उसके पीछे मत पड़ो। दूसरी बात यह है कि हो सकता है कि वह मुरव्वत के कारण कुछ कम दाम में दे दे। इस तरह तुम अपने सदक़े के कुछ भाग को लौटाने वाला क़रार पा जाओगे, जो कि मना है। एक बात यह भी है कि वह तुम्हारे पास से निकल चुका है तथा तुम्हारे गुनाहों को मिटाने और तुम्हारी नापाकियों और अपवित्रताओं को निकालने का कारण बना है, इसलिए उसका तुम्हारे पास वापस आना उचित नहीं है। यही कारण है कि उसे उचित दाम देकर ख़रीदने को भी 'दान की हुई वस्तु को वापस लेने' का नाम दिया गया है। इसी तरह उसे उलटी करके उसे दोबारा खाने के समान बताया गया है। यह दरअसल, इस काम की बुराई बताने और इससे नफ़रत दिलाने के लिए है।