उमरा' और इसी तरह 'रुक़बा' दो तरह के दान हैं, जो लोग जाहिलियत के ज़माने में किया करते थे। उस समय एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को घर आदि यह कहते हुए देते थे कि मैंने तुझे यह घर जीवन भर के लिए दिया, अथवा मैंने तुझ यह घर तुम्हारे जीवन भर अथवा मेरे जीवन भर के लिए दिया। इस तरह का दान करने के बाद लोग दान प्राप्त करने वाले व्यक्ति की मृत्यु की प्रतीक्षा में रहते थे, ताकि दान की हुई वस्तु को वापस ले सकें। ऐसे में, शरीयत ने दान को तो बरक़रार रखा, लेकिन आम तौर पर लगाई जाने वाली शर्त अर्थात वापस लेने को ख़ारिज कर दिया। क्योंकि दान की हुई वस्तु को वापस लेने वाला व्यक्ति उस कुत्ते के समान है, जो उलटी करके दोबारा उसे खा ले। यही कारण है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जीवन भर के लिए दी हुई वस्तु के बारे में यह निर्णय दिया कि वह वस्तु उसी की है, जिसे दान की गई है और उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों की है। तथा आपने लोगों को अपने धन की सुरक्षा करने का आदेश देते हुए फ़रमायाः "अपने धन को रोके रखो और उसे बर्बाद न करो, क्योंकि जिसने जीवन भर के लिए कोई दान दिया, तो वह उसका है, जिसे जीवन भर के लिए दिया गया है, उसके जीवन में भी और मरने के बाद भी तथा उसके उत्तराधिकारियों का है।"