निकाह का अनुबंध बड़ा ही महत्वपूर्ण अनुबंध है। उसके माध्यम से पति स्त्री के उस अंग को हलाल करता है, जिसकी रक्षा में वह सबसे अधिक तत्पर रहती है और इसी अनुबंध के कारण स्त्री अपने पति के मातहत हो जाती है। यही वजह है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह अपने जीवन साथी को चुने और अपनी आँखों से देखकर उसका चयन करे, क्योंकि वही उसके साथ रहेगी और वह ख़ुद अपनी रुचियों और पसंद-नापसंद से अधिक अवगत है। इसी के मद्देनज़र अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस बात से मना किया है कि सय्यिबा स्त्री (जिसकी एक बार शादी हो चुकी हो) का विवाह उससे आदेश लिए बिना कर दिया जाए। इसी प्रकार इस बात से भी मना किया है कि कुँवारी लड़की की शादी उसकी अनुमति प्राप्त किए बिना कर दी जाए। चूँकि कुँवारी लड़की शरमाती अधिक है, इसलिए उसके मामले में अनुमति लेने को पर्याप्त समझा गया है, बल्कि उसकी ख़ामोशी को भी, उसकी सहमति का प्रमाण मानकर, काफ़ी समझा गया।