ज़कात दरअसल धनवानों की ओर से निर्धनों को दिया जाने वाला एक सहारा और सहयोग है। यही कारण है कि ज़कात ऐसे लोगों से नहीं ली जाती, जिनके पास थोड़ा बहुत धन हो और जो धनी न समझे जाते हों। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ज़कात वाजिब होने के लिए धन की निम्न सीमा निर्धारित कर दी है। जो उससे कम धन का मालिक हो, वह निर्धन है और उससे कुछ नहीं लिया जाएगा। सोने के मालिक पर उस समय तक ज़कात वाजिब नहीं होगी, जब तक उसके पास पाँच ऊक़िया सोना न हो। याद रहे कि एक ऊक़िया चालीस दिरहम का होता है। इस तरह, सोने का निसाब दो सौ दिरहम हुआ, जो पाँच सौ नव्वे ग्राम के बराबर होता है। ऊँट के मालिक पर उस समय तक ज़कात वाजिब नहीं है, जब तक उसके पास पाँच या उससे अधिक ऊँट न हों। इससे कम ऊँटों में ज़कात नहीं है। जबकि अनाज तथा फल के मालिक पर उस समय तक ज़कात वाजिब नहीं है, जब तक पाँच वसक़ अनाज अथवा फल न हो। एक वसक़ साठ साअ का होता है। इस तरह गल्ला एवं फल का निसाब तीन सौ साअ हुआ।