हुज़ैल गोत्र की दो सौकनों ने आपस में झगड़ा किया, तो एक ने दुसरे को एक छोटे पत्थर से मार दिया, जो प्रायः क़तल नहीं करता, किन्तु इस से वह मर गई और उसके गर्भ के बच्चे की भी मौत हो गई। तो, नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने निर्णय दिया कि बच्चे की दियत दास अथवा दासी होगी, चाहे भ्रूण पुरुष हो या स्त्री और दियत क़त्ल करने वाली पर होगी। एवं मरने वाली महिला के लिए दियत का फ़ैसला किया, इस लिए कि उसका क़त्ल शिब्हे अमद (जान बूझ कर हत्या करने जैसा) है और दियत कतल करने वाली महिला के रिश्तेदारों पर होगी, इस लिए कि आक़िलह (जिन रिश्तेदारों पर दियत अदा करने की ज़िम्मेवारी हो) की बुन्याद आपसी सहायता पर है (यानी रिश्तेदारों में वही दियत देंगे जो सहायता करने की क्षमता रखते हों, इसी लिए बच्चे और औरतें आदि आग़िलह में शामिल नहीं हैं) और इस लिए कि क़त्ल भूल से हुआ है। और चूँ कि दियत -खून बहा- मक़तूलह के बाद बपौती है।अतः उसके लड़के तथा दुसरे वारिस ले लेंगे, रिश्तेदारों (आक़िलह) के लिए कुछ नहीं होगा। तो ह़मल बिन नाबेग़ा -कतल करने वाली के पिता ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, क्यों हम पर उस भ्रूण का जुर्माना डाला जा रहा है, जो मरा हुआ पैदा हुआ है, न खाया है और न ही पिया है और न ही कुछ बोला है कि उस्के प्राण धारण का ज्ञात हो? यह बात उन्हों ने भाषण और काफ़िया बंदी के अंदाज में कही। तो नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उसकी बात पसंद न आई, क्योंकि उसमें लोगों के धनों को अवैध तरीके से खाने वाले काहिनों की बातों से मिलते जुलते अंदाज़ में शरई विधान का इंकार है।