ईद अल-फ़ित्र और ईद अल-अज़हा के दिन, दो श्रेठ दिन हैं, जिनमें इसलाम की शान व शौकत ज़ाहिर होती है और मुसलमानों के जमावड़े से उनके बंधुत्व के दर्शन होते हैं। हर नगर और क़सबे के लोग अपनी एकता, आपसी प्रेम और सदभाग, इसलाम की सहायता के लिए एकजुटता, अल्लाह के धर्म की प्रतिष्ठा और अल्लाह के धर्म-प्रतीकों के वर्चस्व के प्रदर्शन हेतु एक ही स्थान में जगह होते हैं। यही कारण है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सारी स्त्रियों, यहाँ तक कि अपने घरों के अंदर परदे में रहने वाली युवतियों और ऋतु वाली स्त्रियों को भी निकलने का आदेश दिया। अलबत्ता, ऋतु वाली स्त्रियाँ नमाज़ में शरीक लोगों से अलग रहेंगी। उन्हें शामिल होने का आदेश इसलिए दिया, ताकि भलाई तथा मुसलमानों की दुआ में शामिल हो सकें और उस सभा की भलाई, उसकी बरकत, अल्लाह की रहमत और उसकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें और अल्लाह की दया की छाँव पा सकें। दोनों ईद की नमाज़ फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है।