अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने खसअम क़बीले के एक समूह की ओर जो कि काफ़िर था एक सैन्यदल भेजा,। मुसलमानों को हमलावर होते देख उनमें कुछ लोगों ने यह दिखाने के लिए कि वे मुसलमान हैं, सजदा करने लगे। लेकिन मुसलमानों ने जल्दबाज़ी में उनका वध कर दिया। क्योंकि मुसलमान उन्हें मुश्रिक समझ रहे थे और इसलिए भी कि वे रह भी रहे थे मुश्रिकों के बीच। लेकिन जब यह अच्छी तरह स्पष्ट हो गया कि वे मुसलमान थे, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनकी दियत मुसलमानों की दियत से आधी निर्धारित की। आपने पूरी दियत इसलिए निर्धारित नहीं की, क्योंकि इस क़त्ल का कारण स्वयं वही थे। शरीयत ने काफ़िरों के नगर में रहने को हराम क़रार दिया है। अतः दोनों को एक-दूसरे के साथ नहीं रहना चाहिए और उनमें से एक की आग दूसरे को नहीं दिखनी चाहिए। यानी इतना निकट घर नहीं बनाना चाहिए कि यदि दोनों में से कोई आग जलाए, तो दूसरे को दिख जाए। ऐसा शरीयत ने अविश्वास एवं अविश्वासियों से बेजारी को रेखांकित करने के लिये किया है ।