उमर बिन खत्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) ख़ंदक़ कि दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास सूरज डूबने के बाद क़ुरैश के काफ़िरों को बुरा-भला कहते हुए आए, क्योंकि उन्होंने उनको अस्र की नमाज़ पढ़ने का कोई अवसर नहीं दिया था और वह सूरज डूबने के निकट हो जाने तक अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ सके थे। उनकी बात सुन, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़सम खाकर फ़रमाया कि मैंने भी अभी तक अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ी है, ताकि उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) को कुछ तसल्ली मिल जाए, जिन्हें नमाज़ पढ़ने में देर होने से बड़ी तकलीफ़ हुई थी। फिर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उठकर वुज़ू किया और सारे सहाबा ने भी आपके साथ वुज़ू किया और सूरज डूबने के बाद अस्र की नमाज़ पढ़ी और उसके बाद मग़्रिब की नमाज़ पढ़ी।