अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के काल में जब सूर्य ग्रहण हुआ, तो घबराए हुए खड़े हुए क्योंकि आपकी अपने रब से पूर्ण आगाही यह अनिवार्य करती थी कि आप इनसानों की गुमराही एवं सरकशी के कारण अल्लाह से हद दरजा भयभीत रहें। भयभीत होने का एक कारण यह भी था कि शायद सूर में फूँक मारने का समय निकट आ गया हो। अतः आप मस्जिद गए और लोगों को सूर्य ग्रहण की नमाज़ पढ़ाई। तौबा और क्षमा याचना के इज़हार के लिए इतनी लंबी नमाज़ पढ़ी कि जो पहले देखी नहीं गई थी। फिर जब अपने रब से मुनाजात और फ़रियाद से फ़ारिग़ हो गए, तो लोगों की ओर मुतवज्जे हुए और उन्हें नसीहत की तथा यह स्पष्ट कर दिया कि इन निशानियों को अल्लाह, अपने बंदों की शिक्षा, याद दिहानी और चेतावनी के तौर पर भेजता है, ताकि लोग दुआ, क्षमा याचना और नमाज़ में जुट जाएँ।