जब सन् आठ हिजरी में अल्लाह तआला ने मक्का पर विजय दिला दी और अपने घर को बुतों से पवित्र कर दिया, तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) काबा में दाख़िल हुए। आपके साथ आपके दोनों सेवक बिलाल और उसामा तथा काबा के मुतवल्ली उसमान बिन तलहा (रज़ियल्लाहु अंहुम) भी थे। दाख़िल होने के बाद अंदर से द्वार बंद कर लिए, ताकि लोग यह देखने के लिए भीड़ न लगा दें कि आप इबादत कैसे करते हैं, जो आपके असल उद्देश्य यानी अपने रब से मुनाजात (प्रार्थना) और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करने की राह में बाधा बन जाए। फिर बड़ी देर बाद द्वार खोले। अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा), जो नबी (सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम) के एक-एक कार्य को ध्यान से देखते और उस पर अमल करने के प्रयास में रहते थे, द्वार खुलने के बाद सबसे पहले अंदर गए और बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) से पूछा कि क्या रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अंदर नमाज़ पढ़ी है? तो उन्होंने जवाब दिया कि हाँ, दो यमनी खंबों के बीच में खड़े होकर नमाज़ पढ़ी है। उन दिनों पवित्र काबा छः खंबों पर खड़ा था। नमाज़ पढ़ते समय तीन खंबे आपके पीछे थे तथा दो दाएँ और एक बाएँ। आपके और दीवार के बीच तीन हाथ की दूरी थी। आपने वहाँ दो रकअत नमाज़ पढ़ी और उसके चारों भागों में दुआएँ कीं।