मोमिनों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से जिहाद में शरीक होने की अनुमति माँगी, ताकि जिहाद की फ़ज़ीलत प्राप्त कर सकें। चुनांचे अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि युद्ध करने और शत्रुओं से लड़ने की अनुमति स्त्रियों को नहीं है। क्योंकि उनका शरीर कोमल और दिल नर्म होता है तथा उनके अंदर खतरों का सामना करने की योग्यता भी कम होती है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि स्त्रियाँ ज़ख़्मियों का इलाज करने और प्यासों को पानी पिलाने जैसे काम भी नहीं कर सकतीं। क्योंकि सहीह हदीस में आया है कि उम्म-ए-अतिय्या कहती हैं : मैं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ सात युद्धों में शरीक रही। मैं लोगों के युद्ध में जाने के बाद उनके ठहरने के स्थान में रहती, उनके लिए खाना बनाती, ज़ख़्मियों का उपचार करती और बीमार लोगों की देख-भाल करती थी। आपने आगे कहा कि स्त्रियों का जिहाद हज है। हज एवं उमरा को जिहाद के समान इसलिए कहा गया है कि दोनों में यात्रा करनी पड़ती है, घर से दूर जाना पड़ता है, परिवार को छोड़ना पड़ता है, यात्राओं के खतरे झेलने पड़ते हैं, शरीर को थकाना पड़ना है और धन खर्च करना पड़ता है। इमाम मुस्लिम ने अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णन किया है कि हुनैन के दिन उम्म-ए-सुलैम -रज़ियल्लाहु अनहा- ने एक खंजर अपने पास रख लिया और अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा कि मैंने इसे अपने पास इसलिए रख लिया है कि यदि कोई मुश्रिक मेरे पास आया, तो मैं उसका पेट चीर डालूँगी। यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि स्त्रियों को भी युद्ध की अनुमति है, यद्यपि इसमें इस बात का इशारा है कि वे अपने बचाव के लिए ही युद्ध करेंगी और इसमें इस प्रकार का कोई संकेत नहीं है कि वे दुश्मन की सफ़ में जाकर उनसे मुक़ाबला के लिए सामने आने का आह्वान करेंगी।